श्राद्ध पूजा का सिद्धांत ... Description Of the Puja

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार इंसान की मृत्यु के बाद भी उसकी आत्मा कभी नहीं मरती। दरअसल हिन्दू मान्यताओं के अनुसार एक आत्मा को उसके जीवन के आधार पर स्वर्ग या फिर नर्क में भेजा जाता है। यदि उसने जीवन में अच्छे कर्म किए तो उसे स्वर्ग मिलेगा, लेकिन बुरे कर्म करने वाली आत्मा को नर्क का रास्ता दिखाया जाता है। परन्तु इस फैसले तक पहुंचने से पहले ही आत्मा कई जगहों पर भटकती रहती है, कहते हैं कर्मों के आधार पर आत्मा को देवयोनि या फिर मनुष्य योनि प्राप्त होती है। अच्छे कर्म कर मोक्ष को प्राप्त होने वाली आत्मा देवयोनि को प्राप्त होती है लेकिन वहीं दूसरी ओर अभी भी अपनी इच्छाओं के घेरे में फंसी हुई आत्मा मनुष्य योनि में फिर से जन्म लेने को मजबूर हो जाती है, लेकिन इन दोनों योनि के बीच में है प्रेत योनि, जिससे बाहर आने में ही आत्मा को काफी समय लग जाता है। यह वह समय होता है जब आत्मा वायु रूप में पृथ्वी पर ही भटकती रहती है, जिन रूहों का एहसास मनुष्य को अपने आसपास होता है, वह वही हैं जो प्रेत योनि में विचरण कर रही होती हैं। इस आत्मा को इसी प्रेत योनि से बाहर निकाल आगे के चरण यानि के पितृ चरण तक पहुंचाने के लिए ही पितृ पूजा की जाती है, तो सरल शब्द मैं आप कह सकते है कि पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं तथा तृप्त करने की क्रिया और देवताओं, ऋषियों या पितरों को तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं। तर्पण करना ही पिंडदान करना है।

क्यों करते है श्राद्ध..

क्योंकि, श्राद्ध करने वाले का सांसारिक जीवन सुखमय बनता है। लेकिन एक और सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि श्राद्ध न करने से पितृ क्षुधा से त्रस्त होकर अपने सगे-संबंधियों को कष्ट और शाप देते हैं। अपने कर्मों के अनुसार जीव अलग-अलग योनियों को भोगते हैं, जहां मंत्रों द्वारा संकल्पित हव्य-कव्य को पितृ प्राप्त कर लेते हैं, जो भी श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है उसकी बुद्धि, पुष्टि, स्मरणशक्ति, धारणाशक्ति, पुत्र-पौत्रादि एवं ऐश्वर्य की वृद्धि होती। वह पर्व का पूर्ण फल भोगता है, ऐसी मान्यता है कि श्राद्ध से केवल पितृ ही तृप्त नहीं होते अपितु समस्त देवों से लेकर वनस्पतियां तक तृप्त होती हैं।

श्राद्ध करने की इससे आसान विधि- ...

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध की साधारणत: दो प्रक्रियाएं हैं, पहली है पिंडदान और दूसरी ब्राह्मण भोजन। ऐसा कहा जाता है कि ब्राह्मण के मुख से देवता हव्य को तथा पितृ कव्य को खाते हैं। पितृ स्मरण मात्र से ही श्राद्ध प्रदेश में आते हैं तथा भोजनादि प्राप्त कर तृप्त होते हैं, एकाधिक पुत्र हों और वे अलग-अलग रहते हो तो उन सभी को श्राद्ध करना चाहिए। ब्राह्मण भोजन के साथ पंचबलि कर्म भी होता है, जिसका विशेष महत्व है। साथ ही ध्यान रहे कि ब्राह्मणों के भोजन को पूर्ण विधि-विधान से तैयार किया जाए। इसमें शुद्धता बनाए रखने का विशेष महत्व होता है, श्राद्ध के संदर्भ से शास्त्रों में पांच प्रकार की बलि बताई गई हैं- गौ बलि, श्वान बलि, काक बलि, देवादि बलि तथा पिपीलिका बलि। यहां बलि का अर्थ किसी पशु-पक्षी की कुर्बानी देने से नहीं है। बल्कि आप किस प्रकार का श्राद्ध कर रहे हैं, उसी से संबंधित पशु-पक्षी को भोजन खिलाना होता है। इसे ही शास्त्रों में बलि माना गया है.

भाद्रपद की पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक सोलह दिनों तक का समय सोलह श्राद्ध या श्राद्ध पक्ष कहलाता है। यह वही समय है जब शास्त्रों के अनुसार देवकार्यों से पूर्व पितृ कार्य करने का निर्देश दिया गया है, यूं तो हिन्दू मान्यताओं के आधार पर एक आम बात सभी में प्रचलित है कि जिस भी दिन किसी स्त्री या पुरुष की मृत्यु हो, उसी तारीख को श्राद्ध किया जाता है। लेकिन इसके अलावा भी अन्य तारीख हो सकती हैं, जैसे कि, सौभाग्यवती स्त्री का श्राद्ध नवमी के दिन किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति संन्यासी है तो उसका श्राद्ध द्वादशी के दिन किया जाता है। शस्त्राघात या किसी अन्य दुर्घटना में मारे गए व्यक्ति का श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है, कई बार ऐसा होता है कि हमें पाने किसी पूर्वज का श्राद्ध तो करना है लेकिन हम उनकी मृत्यु तिथि नहीं जानते। ऐसे में यदि हमें अपने किसी पूर्वज के निधन की तिथि नहीं मालूम हो तो उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है इसीलिए इसे सर्वपितृ अमावस्या भी कहा जाता है, आश्विन शुक्ल की प्रतिपदा को भी श्राद्ध करने का विधान है। इस दिन दादी और नानी का श्राद्ध किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार यह कुछ ऐसी तारीखें हैं जब आप श्राद्ध करवा सकते हैं।

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हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार अश्विन माह के कृष्ण पक्ष से अमावस्या तक अपने पितरों के श्राद्ध की परंपरा है। यानी कि 12 महीनों के मध्य में छठे माह भाद्र पक्ष की पूर्णिमा से (यानी आखिरी दिन से) 7वें माह अश्विन के प्रथम पांच दिनों में यह पितृ पक्ष का महापर्व मनाया जाता है। सूर्य भी अपनी प्रथम राशि मेष से भ्रमण करता हुआ जब छठी राशि कन्या में एक माह के लिए भ्रमण करता है तब ही यह सोलह दिन का पितृ पक्ष मनाया जाता है, इस वेबसाइड द्वारा वैदिक कर्मकाण्ड हेतु सुगमता से समग्र भारत में लोगो को योग्य पुरोहितों की व्यवस्था मिले यही हमारा मुख्य उद्देश्य है, तो यदि आपको भी श्राद्ध पूजा के लिए किसी भी अनुभवी पंडित की जरुरत है तो आप हमसे अपनी लोकेशन के अनुसार दिए गए हेल्पलाइन नंबर्स के माध्यम से संपर्क कर सकते है, क्यूंकि आवश्यकता अनुसार चयनित जगह पर पंडित जी उपलब्ध करना हमारी पहली प्राथमिकता होती है...!!

Auspicious Day Puja Time Venue
Starting Day Of Pitru Paksha Morning Time (Avoid Rahukal) Temple, House, River Ghat

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