श्री गणेश जी की विधिवत पूजन विधि... Description Of the Puja

गणेश शिवजी और पार्वती के पुत्र हैं। उनका वाहन डिंक नामक मूषक है। गणों के स्वामी होने के कारण उनका एक नाम गणपति भी है। ज्योतिष में इनको केतु का देवता माना जाता है और जो भी संसार के साधन हैं, उनके स्वामी श्री गणेशजी हैं। हाथी जैसा सिर होने के कारण उन्हें गजानन भी कहते हैं। गणेश जी का नाम हिन्दू शास्त्रो के अनुसार किसी भी कार्य के लिये पहले पूज्य है। इसलिए इन्हें प्रथमपूज्य भी कहते है, गणपति आदिदेव हैं जिन्होंने हर युग में अलग अवतार लिया। उनकी शारीरिक संरचना में भी विशिष्ट व गहरा अर्थ निहित है। शिवमानस पूजा में श्री गणेश को प्रणव (ॐ) कहा गया है। इस एकाक्षर ब्रह्म में ऊपर वाला भाग गणेश का मस्तक, नीचे का भाग उदर, चंद्रबिंदु लड्डू और मात्रा सूँड है, भगवान गणेश की विधि विधान से पूजा अर्चना की जाती है। वह भक्तों के दुखों को हर लेते हैं और उनकी मनोकानाओं की पूर्ति करते हैं।

उद्देश्य ..

भगवान गणपति ऋद्धि-सिद्धि और सौभाग्य के देवता माने जाते हैं। श्रीगणेश पूजा बेहद कल्याणकारी होती है, इसलिए गणपति की पूजा पूरे विधि-विधान से करनी चाहिए, भगवान गणपति हर तरह की मनोकामना पूरी करते हैं। विघ्नहार्ता अपने भक्तों को सफलता, बुद्धि पुत्ररत्न, धन और समृद्धि सब कुछ देते हैं। इसलिए इनकी पूजा भी उतने ही तनमयता और विधि- विधान के साथ करनी चाहिए।

संक्षेप में पूजा विधि निम्नलिखित है- ...

सर्व प्रथम तो यदि संभव हो तो परिवार के सभी लोग पूजा स्थल पर मौजूद रहें। प्रात: दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होने के पश्चात स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसे उपरांत पूजा घर में जाएं, सुबह सुबह अपने घर के द्वार में पाने के पत्ते की बंदनवार लगाएं और कलश की स्थापना करें। 'मम सर्वकर्मसिद्धये सिद्धिविनायकपूजनमहं करिष्ये' मंत्र से संकल्प करें, इसके बाद पूजा की चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर 'स्वस्तिक' बनाएं और भगवान गणपति की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। फिर उनको फूल, अक्षत्, चंदन, धूप आदि अर्पित करें। इसके पश्चात विघ्नहर्ता गणेश जी को 21 दूर्वा अर्पित करें। ध्यान रहे कि उनके 10 नाम (गणाधिप, उमापुत्र, अघनाशक, विनायक, ईशपुत्र, सर्वसिद्धिप्रद, एकदन्त, इभवक्त्र, मूषकवाहन और कुमारगुरु।) हैं, प्रत्येक नाम का स्मरण कर उनको दो दूर्वा चढ़ाएं। इसके बाद अंतिम बचा हुआ दूर्वा वरदगणेश को अर्पित करें, वरदगणेश को अंतिम दूर्वा चढ़ाने के बाद धूप, दीपादि से पूजा सम्पन्न करें। अन्त में गणेश जी को घी में बने 21 मोदक अर्पित करें, इसके बाद आरती और कीर्तन करें।

ओम् गणेशाय नम: का जप करते हुए गणपति को प्रणाम करें। और उनसे कहें कि आप अपनी पत्नी ऋद्धि-सिद्धि के साथ हमारे घर में विराजमान हों। अगर भूलवश पूजा में हमसे कोई गलती हो जाती है तो कृपया कर हमको क्षमा करें और अपना आशीर्वाद हमारे परिवार पर बनाए रखें।

Time And Other Puja Rituals Details Find below Muhurat and Work Place Details

वैसे तो किसी भी पूजा के लिए बेस्ट मुहूर्त हर दिन अलग अलग होता है, लकिन गणेश चतुर्थी का अपना एक विशेष महत्व होता है, गणेश चतुर्थी के दिन गणपति की पूजा दोपहर के समय करना शुभ माना जाता है, क्योंकि मान्यता है कि भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को मध्याह्न के समय गणेश जी का जन्म हुआ था, तो विशेष पूजा व स्थापना के लिए आप हमसे संपर्क करें ताकि हम आपको पंचांग से देखकर दिन के अनुसार सही समय व सही मुहूर्त की जानकारी दे सकें..!!


Auspicious Day Puja Time Venue
Wednesday Morning Time (Avoid Rahukal) Home & Office
Thrusday Morning Time (Avoid Rahukal) Home & Office
Friday Morning Time (Avoid Rahukal) Home & Office
Sunday Morning Time (Avoid Rahukal) Home & Office

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